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Bhadra rishi aur bhadra joshi brahman ( भद्र ऋषि और भद्र जोशी ब्राहमण )

 

भद्र ऋषि

 भद्र ऋृषि

भारत  में अनेक महान ऋषि हुए । इन्हीं में एक हैं भद्र ऋृषि । भद्र ऋषि के पिता का नाम सुमेरु ऋषि और माता का नाम मेनका था । जिस पर्वत पर सुमेरू ऋृषि तपस्या करते थे और पुत्र प्राप्ति की कामना करते थे उस पर्वत का नाम उनके नाम पर सुमेरू पर्वत पड़ा । उनकी माता के नाम पर एक पर्वत का नाम मैनाक्य पड़ा । उसी पर्वत की एक शिखर का नाम भद्र पर्वत पड़ा जिसपर भद्र ऋषि ने भगवान विष्णु की तपस्या की । भगवान विष्णु ने उनकी तपस्या से प्रशन्न होकर मानव अवतार में राम के रूप में उन्हें साक्षात दर्शन का वरदान दिया । वनवास के समय राम सीता और लक्ष्मण ने उन्हें यही दण्डक वन में दर्शन दिया । निरन्तर तपस्या से प्रशन्न होकर बाद में स्वर्ग लोक से भगवान राम ने पुनः भद्र ऋषि सीता राम चंद्र के रूप में दर्शन दिया तथा वहीं मूर्ति रूप में विराजमान होना स्वीकार किया । यह स्थान आज भद्राचलम् कहलाता है । यही प्रसिद्ध सीता रामचंद्र मंदिर है । इसे पक्षिण की अयोध्या कहते है । भद्र ऋृषि ने दक्षिण में आर्य धर्म और संस्कृति का प्रचार प्रसार किया । पौराणिक आख्यानों के अनुसार उन्होंने भारत के अनेक  तीर्थों का दर्शन किया तथा उसका महात्म बतलाया । भद्र ऋृषि के वंशज भद्र ब्राहमण आज भी  . तीर्थों का महात्म बताते है और  तीर्थों में दान दक्षिणा ग्रहण करते हैं । भद्र ऋृषि भारत के महान सनातन परम्परा के ऋृषि थे और ज्योतिष मौसम विज्ञान के अधिष्ठाता थे । उनका जन्म भद्रिका योगिनी मूहर्त गुप्त नवरात्रि की नवमी को हुआ था इसलिए उनका नाम भद्र रखा गया था । कालान्तर में उनके वंशज और शिष्य परम्परा के ब्राहमण भद्र और स्त्रियां भड्डली कहलाई । उन्ही की स्मृति में भद्रिका नवमी ( भड्डली नवमी ) को उन की जयंती आज भी मनायी जाती है । यह अक्षय तृतीया की तरह अबूझ शुभ मूहूर्त होता है । इस तिथि को आषाढ . शुक्ल पक्ष नवमी कहते है । सभी वैवाहिक आदि शुभ कार्य बिना पंचांग देखे किए जा सकते है । भद्र ब्राह्मण कालान्तर में जोशी भड्डरी ब्राहमण कहे जाने लगे । इस वंश में मध्य काल में प्रसिद्ध घाघ भड्डरी हुए ।

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