लपती भाषा : जोशी भड्डरी डकोत समुदाय की विशेष भाषा Lapti an old language used by dakot community and joshi bhaddari
लपती भाषा : विलुप्ति के कगार पर
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लपती भाषा भारत के भृगुवंशी जोशी भड्डरी डाकोत देशांतरी समुदाय की एक अति प्राचीन आषा है जो अब विलुप्ति के कगार पर है । लगातार आधुनिक शिक्षा हिन्दी और अंग्रेजी के बढ़ते प्रचलन और निरन्तर पारम्परिक कार्य व्यापार और व्यवसाय से पलायन के कारण अब इस समुदाय के लोग अपनी इस प्राचीन भाषा को बोलना छोडते जा रहे है । नए शिक्षित परिवारों में कर्मकाण्ड का माध्यम अब संस्कृत ही होता है और बोलचाल की भाषा हिन्दी अंग्रेजी होती है । केवल कुछ परिवार जो आज भी पारम्परिक पैतृक ग्रह विप्र का जजमानी कर्म करते हैं अथवा तीर्थ स्थानों में देव दर्शन कराने अथवा नदी स्नान का दान दक्षिणा लेने मंदिरों में चंदन टीका लगाने गंगा जल प्रसाद वितरण का काम करते हैं उन्हीं जोशी भड्डरी डाकोत परिवारों में यह लपती भाषा बोली जाती है । आम तौर पर इस समुदाय के लोग जो किसी दूसरे पेशे में हैं और भविष्य बताने ग्रहों की शांति कराने और ग्रहादि का दान लेने का कार्य नहीं करते वे लोग लपती भाषा के कुछ शब्द मात्र जानते है । विशेष रूप से वे लपती भाषा में अपने समाज का नाम छिबारी के रूप में जानते है ताकि परस्पर परिचप पहचान कर सके । दूसरे वे कुछ खाने पीने की चीजों का नाम लपती में जानते हैं । इस समुदाय की नयी पीढ़ी के बच्चे अब लपती का एक शब्द भी नहीं जानते । अगर ऐसा ही चलता रहा तो भारत में लपती भाषा जानने वालों की संख्या समाप्त हो जाएगी और भारत की एक प्राचीन एक विशेष जोशी समुदाय की भाषा विलुप्त हो जाएगी ।
दुर्भाग्य है कि लपती भाषा को थोड़ा बहुत जानने वाले जोशी डाकोत जाति के लोग भी इस भाषा के बारे में कुछ बताना नहीं चाहते । वे इसे अपनी गुप्त पहचान वाली गोपनीय भाषा ही मानते हैं और इस लपती भाषा के बचे खुचे शब्दों को सार्वजनिक करना नहीं चाहते । इस तरह लगता है कि भृगुवंशी जोशी भड्डरी डाकोत समुदाय की यह गुप्त भाषा आने वाले कुछ वर्षों में लुप्त हो जाएगी ।
भाषा के संरक्षण के लिए काम करने वाली संख्याओं और शोधार्थियों के प्रयास से इस लपती भाषा के बचे खुचे प्रचलित शब्दों का संचयन करते कम से कम इस विलुप्त होती भाषा को सुरक्षित किया ही जाना चाहिए ।
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