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घाघ भड्डरी लोक ज्योतिष परम्परा और विशेष ज्योतिषी वंश (Gagh Bhaddari lok jyotish parampara aur vidhesh jyotishi vansh)

 घाघ भड्डरी डाक भड्डरी लोक ज्योतिष परम्परा और विशेष ज्योतिषी वंश
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मध्य काल महाकवि घाघ भड्डरी पर्जन्य शास्त्र के महान ज्योतिषी कहावतकार हुए जिन्होने ज्योतिष की भद्र ऋषि परम्परा जो कि मूलतः भृगु ऋषि की भृगु संहिता की ज्योतिष का विस्तार था उसे जन भाषा में लोकप्रिय बनाने और कृषि विज्ञान के सिद्धांत संस्कृत भाषा की जगह लोक भाषा में रूपांतरित कर उसमें अपने अनुभव को जोड़कर अभूतपूर्व कार्य किया । ज्योतिष की भड्डरी परम्परा  यद्यपि बहुत प्राचीन थी जिसे भद्र ऋृषि वंश की वंश परम्परा और शिष्य परम्परा के ज्योतिषी ब्राहमण सदियों से पारम्परिक और पैतृक ज्ञान के रूप में संरक्षित करते रहे थे जो भद्र ज्योतिषी ब्राहमण भद्र जोशी गणक नक्षत्र जीवी मौहूर्तिक ब्राहमण ग्रहविप्र समुदाय के रूप में प्रतिष्ठित थे । ऐतिहासिक काल के ऐसे भद्र ज्योतिषी जोशी बाहमणों में बराह मिहिर आर्य भट्ट का नाम प्रमुख है । 
भारत में पौराणिक ऋषि भद्र ऋषि की ज्योतिष परम्परा में भारत के हर क्षेत्र में अनेकानेक भद्र ज्योतिषी जोशी भड्डरी भविष्य कथन करने वाले पंडित हुए किन्तु होक ज्योतिष की इस महान परम्परा को सर्वाधिक लोकप्रिय मध्य काल में महाकवि घाघ ने बताया और घाघ भड्डरी का नाम लोक की जुबान पर चढ गया ।   इसे डाक भड्डरी परम्परा भी कहा जाता है । डाक कवि के रूप में भी झ्हें जाना जाता है । डाक का पर्यायवाची घाघ होता है । दोनो का अर्थ चतुर और सयाना होता है । इस तरह ये डाक कवि घाघ कवि जो डंक ऋषि की डामर ज्योतिष तंत्र परम्परा शैव शाक्त जान परम्परा और भद्र ऋषि की वैष्णव भक्ति और ज्योतिष परम्परा का मिश्रित रूप डाक भड्डरी ज्योतिष परम्परा के रूप में स्थापित हुआ ।
अबकबर के समकालीन महाकवि घाघ भड्डरी का नाम बहुत प्रसिद्ध हुआ क्योंकि इनके बचनों को आधार बनाकर भारत के किसानों ने अपने जीवन और कृषि कर्म में बहुत सुधार किया और इन्हें किसान पंडित मानकर किसान हितैषी कृषक मार्गदर्शक के रूप में जन जन ने स्वीकार किया । बाद में इस घाघ भड्डरी डाक भड्डरी परम्परा के जोशी ब्राहमण ग्रहविप्र नक्षत्र जीवी ग्रामजोशी और ग्राम पुरोहित के रूप में किसानों द्वारा गोव ग्राव में बसाए गए और राजपुरोहित ज्योतिषी से अलग ग्राम जोशी ग्राम पुरोहित की तरह जनता द्वारा संरक्षित किए गए । जनता के बीच रहने और आम जनता के संरक्षण में रहने तथा विना भेद भाव के सभी वर्णों से दान दक्षिणा स्वीकार  करने तथा सभी वर्णों की पुरोहिती स्वीकार करने के कारण इन ग्राम जोशियों को राजाश्रयी ब्राहमण समुदाय से प्रथक वर्ग के रूप में जोशी भड्डरी डाकोत नाम से पृथक जातीय पहचान मिली । और यह एक स्वतंत्र ब्राहमण वर्ग बन गया ।
किन्तु समय के बदलाव में केवल पारम्परिक ज्योतिष कर्म भविष्य बताकर जीविका चलते और ग्रहादि का दान दक्षिणा लेने मात्र से इनका जीवन स्तर हगातार गिरता गया । यह समाग शिक्षा संस्कार से दूर होता गया और ज्योतिष भविष्य कथन देवदर्शन कराने स्नान आदि का दान दक्षिणा पर निर्भर रहने के कारण पिछड़ता चला गया । इस तरह ज्योतिष की महान घाघ भड्डरी डाक भड्डरी परम्परा   विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुकी है।
सामाजिक अर्थिक शैक्षणिक राजनैतिक रूप से पिछड़ चुके घाघ भड्डरी डाक भड्डरी परम्परा के वाहक जोशी भड्डरी डाकोत समाज के ब्राह्मण पुरोहित न केवल अपनी भद्र ज्योतिष परम्परा को भुला चुके हैं बल्कि ग्रह शांति और क्षेत्रपाल बलि कर्म के वैदिक पौरोहित्य के कर्मकाण्ड के ज्ञान से से दूर हो चुके है जिसका परिणाम है कि इन्हें विद्वेषी पुरोहित समाज दान दक्षिणा का असली सुपात्र ब्राहमण हो मानता है और ग्रहादि का दान इन्हें ही देता दिलवाता भी है किन्तु कर्मकाण्ड स्वयं करता है इनका पूजन ब्राहमण पूजन की तरह नहीं करवाता । ग्रहादि का मूल्यवान दान दक्षिणा तो स्वयं ग्रहण कर लेता है लेकिन सुफल न दे सकने के कारण दान का कुछ अंश माग इहें दिलवाता है । इस तरह जोशी भड्डरी डाकोत परम्परा के महान जोशी ब्राहमणों का निस्टर हीनता से ग्रस्त होता चला गया।
द्वेषी जनों ने निस्तर जोशी भड्डरी डाकोत परम्परा के महान पूर्वजों के साथ और इस परम्परा से जुड़े ब्राहमण समूह के साथ सौतेला व्यवहार किया सामाजिक भेदभाव किया इनका दमन और शोषण किया तरह तरह की किवदंतियां गढ़कर इन्हें बदमान किया और समय समय पर लगातार इतना नीचा दिखाया कि आज तक यह समाज उस हीन भावना से उबर नहीं पाया है । इस वर्ग का पढ़ा लिखा व्यक्ति अपने जातीय नाम से ही दूर भागता है । अपने किसी महान से महान पूर्वज का भी नाम जुबान पर नहीं लाना चाहता ।
यह स्थापित सत्य है कि किसी संस्कृति या परम्परा को उसके वेशज ही सुरक्षित रखते है किन्तु जिस परम्परा के वंशज ही इतनी दयनीय सोच की स्थिति में पहुँच गए हो और छिपकर जीने लगे हो उस परम्परा को उनके द्वारा तो संरक्षित किए जाने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती ।
भारतीय ज्योतिष की घाघ भड्डरी या डाक भड्डरी लोक ज्योतिष परम्परा पर आज बड़ी गम्भीरता से निष्पक्ष शोध की आवश्यकता है यह परम्परा हमारी भारतीय संस्कृति और परम्परा की गौरवपूर्ण उपलब्धि है इसे पूरे समाज को मिलकर सहेजने की आवश्यकता है। जोशी भड्डरी डाकोत जैसे प्राचीनश्रोत्रिय ग्रहविप्र ब्राहमण समुदाय के
साथ जो सामाजिक भेद भाव हुआ है उसे दूर करके उन्हें मुख्य धारा में लाने के उपाय के विषय में भी समाज को सोचना चाहिए ।  आखिर भारत के महान भृगु वंशज कब तक दर दर की ठोकरे खाते रहेगे । दान दक्षिणा के नाम पर पुरोहित समाज कब तक इनके साथ भिक्षुक जैसा बर्ताव करवाता रहेगा । ब्राहमण का सम्मान ब्राहमण ही कैसे इस तरह गिरता रह सकता है ।
क्या पौरोहित्य कर्म में लगे कर्मकाण्डी ब्राहमण
इन जोशी भड्डरी डाकोत ब्राह्मणों के मान भंग के दोषी नहीं हैं और आज भी एक ब्राहमण वर्ग को दोन हीन दशा में रखने के जिम्मेदार नहीं है । वे क्यों शास्रीय विधि विधान से ग्रहशांति कर्म में जोशी भड्डरी डाकोत ब्राहमणों का जजमान द्वारा पूजन नहीं करवाते ? क्यों केवल कुछ दान जोशी भड्डरी डाकोत को या भिखारी को देने का उपाय बताते है । उन ब्राहमणों को शर्म क्यों नहीं आती जो भिखारी और जोशी भड्डरी डाकोत ब्राह्मणों को एक बराबर रख देते हैं । ब्राहमण पुरोहितों द्वारा दूसरे ब्राहमण समाज का ऐसा अपमान क्या बंद नहीं होना चाहिए । गरीबी से किसी का ब्राहमणत्व तो नही चहा जाता । भारत के किसी धर्म ग्रंथ में जोशी भड्डरी डाकोत ब्राहमण वंश को हीन नही बताया न ही ग्रहादि के दान या उपासना को निम्न कर्म तो जोशी भड्डरी डाकोत समुदाय के साथ जो कि महान घाघ भड्डरी डाक भड्डरी ज्योतिष परम्परा के वाहक ग्रहविप्र है उनके साथ आज भी भेद भाव क्यों इस पर विचार किए जाने की आवश्यकता क्या नहीं है ?
आइए इस समय न केवल विलुप्ति के कगार पर खड़ी प्राचीन घाघ भड्डरी लोक ज्योतिष परम्परा की खोज और संरक्षण की आवश्यकता है बल्कि इस महान वंश और जाति के महापुरुषों और वंशजों को भी सामाजिक न्याय दिलाने की जरूरत है ।

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